ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया न्यूज:  
    ! मेरी प्यारी माँ !
अब क्या लिखूं उसके बारे में मैं।
अब क्या लिखूं उसके बारे में मैं।
जिसने मुझे मुझसे ज्यादा जाना है।
क्योंकिं उसका रिश्ता मुझसे  9 महिने ज्यादा पुराना है।
अगर पिता ने चलना सिखाया था।
तो उसने भी जिम्मेदारियों का बोझ उठाया था।
चोट मुझे लगती थी, आंख उसकी भर आती थी।
चाहे कैसी भी हो परिस्थिति चेहरे से नहीं जताती थी।

बचपन में विधवा माँ को देख उसने मन में ठानी थी।
जैसी भी हो परिस्थिति हार नहीं अपनानी थी।
आई थी वो घर छोड़ कर अपना,एक नया घर अपनाया था।
जिम्मेदारियों को गले लगाकर ख्वाहिशों का गला दबाया था।
पिछड़े कल की नारी थी,शिक्षा की वह अधिकारी थी।
गरीबी के हालातों में यह अधिकार भी हारी थी।
लाख़ अत्याचार किये लोगों ने पर हौसला नहीं डिगा पाये।
जान तक लेनी चाही पर सयंम नहीं हिला पाये।

मुसीबतों को झेलकर जो सीख़ उसने सिखलायी थी।

औलाद ने उसकी आकर वक्त के आवेश में एक पल में झुठलायी थी।
ना मानकर उसने हार संयम को अपने साधा था।
थामकर हाथ बेटी ने उसकी धीरज को उसके बाँधा था।
देख संघर्ष उसका मैने मन को अपने समझाया था।
मुह तोड़ जवाब देना है अपनी कामयाबी से उन सबको जिसने दिल को उसके दुखाया था।

चलते हुए जीवन में आस अभी जारी है।
क्या ? मिलेगा वह सम्मान उसे जिसकी वह अधिकारी है।
यह कविता नहीं उसके बीते कल की झलक है।
जिसे याद करके अकसर भीग जाती मेरी पलक है।

रूह काँप जाती है मेरी सोचकर उसको खोने की ।
जब होती है वो पास मेरे तो मिट जाती है सारी वजह मायूस होने की।
जिसके एहसानों का मेरे सिर पर भार है, वो मेरी माँ मेरा पहला प्यार है।

BY   हर्षिता, निशा भार्गव    ( ग्वालियर म.प्र )

               

 

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