ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया न्यूज: आज हरियाणा रोडवेज कर्मचारी यूनियन तालमेल कमेटी की बैठक हुई, जिसमें सरकार और कर्मचारियों के बीच किलोमीटर स्कीम पर सहमति नहीं बनी। सरकार कह रही है कि हम टेंडर देंगे, लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि सरकार टेंडर न दे।

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दरअसल, किलोमीटर स्कीम में हुए घोटाले के बाद जब विजिलेंस जांच हुई, तो टेंडर में अनियमितिता पाई गईं और सरकार ने भी टेंडर को रद्द करके उसका शपथ पत्र हाईकोर्ट में दिया। बाद में हाईकोर्ट से टेंडर रद्द करने का शपथ पत्र वापिस लेते हुए किलोमीटर स्कीम की बसों के अस्थाई परमिट को जारी करने की कोशिश की जा रही है, जिस पर कर्मचारी कह रहे हैं कि अगर सरकार ने हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान किलोमीटर स्कीम पर अपनी फैसला वापिस नहीं लिया, तो वे हड़ताल करेंगे।

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क्यों नहीं बन रही सरकार और कर्माचरियों के बीच सहमति ?

आपको बता दें कि किलोमीटर स्कीम से हरियाणा रोडवेज के कर्मचारी सरकार से इसलिए खफा हैं क्योंकि इस स्कीम से रोडवेज विभाग में निजीकरण होगा। साथ ही स्कीम के तहत ड्राइवर निजी कंपनी रखेगी और कंडक्टर रोडवेज विभाग, जो इस विरोध का सबसे बड़ा कारण है। कर्मचारी विभाग में निजीकरण नहीं चाहते और सरकार को अपना निर्णय लेने के लिए चेतावनी भी दे रहे हैं। उन्होंने साफ कह दिया है कि सरकार अपना निर्णय वापिस नहीं लेगी, तो वे फिर से सरकार के खिलाफ हड़ताल करेंगे।

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क्या है किलोमीटर स्कीम ?

हरियाणा सरकार ने राज्य में बसों की कमी को देखते हुए इस योजना को शुरू किया था। सरकार ने निजी बसों की सुविधा यात्रियों को देने का एक प्लान भी तैयार किया था। इसी के चलते हरियाणा रोडवेज मुख्यालय ने टेंडर आमंत्रित किए थे। सरकार ने ये योजना ग्रामीण इलाकों में लोगों को बस सुविधा पहुंचाने के लिए बनाई थी।

CM Manohar

जिसके बाद सरकार के निर्देशानुसार ही रोडवेज विभाग ने प्रति किलोमीटर के हिसाब से निजी बसें हायर करने का फैसला लिया था, साथ ही ये भी फैसला लिया गया कि ड्राइवर निजी बस मालिकों के होंगे और कंडक्टर रोडवेज विभाग नियुक्त करेगा। जिसके बाद हरियाणा रोजवेज यूनियनों ने सरकार की इस स्कीम का जमकर विरोध किया और पिछले साल 2018 में 18 दिन की एक हड़ताल भी की गई। बाद में मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, तो कोर्ट के आश्वासन के बाद कर्मचारियों ने हड़ताल खत्म की।

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क्यों कर्मचारी हैं नाराज ?

दरअसल, हरियाणा सरकार का किलोमीटर स्कीम शुरू करने का फैसला जी का जंजाल बन गया है, इस स्कीम के तहत घोटाला सामने आया, जिसे सीएम तक ने भी स्वीकार किया। अब हुआ ये कि सरकार ने जब स्कीम को लेकर टेंडर जारी किए, तो कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से केवल अपने खास लोगों को ही टेंडर दिए गए। टेंडर ऑनलाइन जारी हुए, तो बीच के कुछ अधिकारियों ने इसकी जानकारी अपने खास लोगों को दी और उन्होंने बोली लगाई, जिसके बाद टेंडर तुरंत उन्हें दे दिए गए।

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सिलसिला यही नहीं थमा, बल्कि वैबसाइट को जान बूझकर लो कर दिया गया और कुछ समय में पूरी की पूरी वैबसाइट को ही बंद कर दिया गया। चौंकाने वाली बात तो इस पूरी मामले में ये सामने आई कि जहां विभाग में एक फाइल को साइन होने में कई महीनों लग जाते थे, वहां एक ही दिन में फाइल को सभी अधिकारियों से लेकर सीएम तक ने पास कर दिया। इसके बाद जहा मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, तो विजिलेंस ने रिपोर्ट पेश की, घोटाला उजागर हुआ और सरकार ने 510 बसों का टेंडर भी रद्द करने की घोषणा कर दी। कई अधिकारियों को खुलासे के बाद दोषी पाए जाने पर सस्पेंड भी किया गया।

 

 

 

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