ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया : ‘प्रेम’ एक ऐसा विषय है, जिस पर लिखा और कहा बहुत कुछ गया है। चेतन से लेकर अवचेतन तक को जागृत करने में सक्षम ‘प्रेम’ को लोग विभिन्न प्रतिबिंब, विभिन्न आयामों में देखते हैं, लेकिन कोई भी ‘प्रेम’ को समझने में पूरी तरह सफल नहीं होता है। दरअसल, ‘प्रेम’ को तर्क-वितर्क, आयाम और प्रतिबिंब से देखने पर एक नश्वरता पनपती है, जिसमें ना तो कोई प्रयास होता है और ना ही किसी तरह का उत्साह। ‘प्रेम’ को समझने के लिए प्रेममय होना पड़ता है। ‘प्रेम’ के उसी मदहोश करने वाले अनुभव को जीकर जब शब्द बाहर निकलते हैं तो ‘मैंने अपने हिस्से का लिख दिया’ नामक कविता पैदा होती है। तो, बिना वक्त गंवाए आप भी समझे ‘प्रेम’ को एक नए नजरिए से।

मैंने अपने हिस्से का लिख दिया
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जैसे कि आज मैं जाने के लिए तैयार हूं
मैं कुछ लिखना चाह रहा था,
चाहता था उसमें लिखूं तमाम खुशियां
कि सभी उसे जिंदगीभर पढ़ते रहे खुशियों से।

मैं उसमें लिखना चाह रहा था प्याज की खुशबू
और सब्जी के छौंकने की आवाज भी,
जैसे सरसों के पीले फूल पर भंवरें मंडराते हों
जैसे आम के मंजर पर मधुमक्खियां भिनभिनाती हों।

मैं बसंत के मौसम पर भी लिख सकता था
मैं नई कोपलों को भी कविता में ढाल सकता था,
मैं लिखता कि कैसे मैं सरपट दौड़ता था
मैं कैसे कुआं में कूदकर बाल्टी निकालता था।

मैं उसमें सबकुछ समेट देना चाहता था
जिंदगी, संघर्षों और तमाम झंझावतों को,
यह लिखता कि आज जिंदगी बहुत बेमजा है
कि जिंदगी में खुशियों का नमक गायब है।

कि हंसी की मिठास बहुत महंगी हो चुकी है
कि मैं दुनिया की फिक्र नहीं करना चाहता,
लेकिन मैं तो मैं हूं, एकदम मैं
औसत से भी निम्न इंसान हूं मैं।

इसलिए मैं नहीं लिख सका
मेरे जैसा इंसान लिख भी नहीं सकता है,
शायद मैं लिखना भी नहीं चाहता
अब शब्दों के रास्ते जिंदगी नहीं जीना है मुझे।

अब शब्दों को मैं दरकिनार करता जा रहा हूं
अब मैं खामोशी के शब्दों को गढ़ रहा हूं,
मैंने अपने दोनों हाथों को छेनी-हथौड़ी बना लिया है
खामोशियों पर लगातार चलाता जा रहा हूं।

मैं नहीं लिखना चाहता कि दर्द से कविता निकलती है
मैं अब संदेश नहीं देना चाहता किसी को,
मैं प्रेम के प्रतिबिंबों पर भी लिखना चाहता था
मैं लिखना चाहता था संवेदनाओं पर।

कि कैसे आकाश और धरती का आलिंगन महत्तवपूर्ण है
कि कैसे बारिश और पेड़ों की दोस्ती ताउम्र है,
कैसे पहाड़ों से झरने जुदाई का गीत गाते बढ़ती हैं
कैसे तालाब के सूखने पर मछलियां तड़पती हैं।

मैं ठंड और गर्मी के मौसम पर लिख सकता था
मैं लिख सकता था इनके मिलन के बारे में,
मैं मलना चाहता था अपनी कविता में गुलाल
मैं सात रंगों को मिलाकर एक नया रंग बना सकता था।

लेकिन जिंदगी जीना और लिखना मुश्किल है
मैं लिखकर नुमाइश नहीं करना चाहता,
मैं खामोशियों को शब्द नहीं देना चाहता
लिहाजा मैं खामोश हूं, एकदम खामोश।

मेरी कविता भी खामोश होगी और गंभीर भी
लेकिन मेरी कविता से तुम मत समझना मुझे कुछ भी,
मैंने इसलिए नहीं लिखा कि ये मुश्किल है
कोशिश बहुत की पर नहीं लिख सका।

आज पहली बार शब्द पल्ले नहीं पड़े मेरे
आज पहली बार हिम्मत नहीं हुई लिखने की,
मैंने अपने हिस्से का लिख दिया
और तुम अपने हिस्से की समझ लेना।

(समाप्त)

अभिषेक मिश्रा
लिविंग इंडिया न्यूज, मोहाली, चंडीगढ़ (पंजाब)
मोबाइल : 9334444050, 9939044050

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