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बुलंद चेतना और परिपक्व जीवन-दर्शन अरुणाचल की स्त्रियों की सजीव मनोभूमि हैं जिससे वे जिंदगी के हर खुरदरेपन को साधती हैं। आईनम की कविता साफगोई से बात कहती है, तो स्त्रियों के भीतर की लोच और दृढ़ता अकस्मात प्रकट हो जाती है। यह कविता उनके मन के चित्रपट पर उभरे भावों की कहानी है। उनकी भाषा में लय और अपनेपन की रवानी है जो पढ़ने में अरुणाचल के भू-दृश्यों की तरह ही खूबसूरत और शांत है; किन्तु बेहद सजीव। इनमें साँस है और धड़कन भी। दुख-सुख की कतरने और उतार-चढ़ाव भी हैं। अरुणाचल एकबारगी सम्पूर्ण भारत बन जाता है। उत्तर-पूर्ण, दक्षिण-पश्चिम की स्त्रियाँ एकाकार हो उठती हैं-झुंड में, समूह में, साथ में। यह सामूहिकता सशक्तिकरण का विज्ञापन नहीं, सौ फीसदी यथार्थ है।

मैं पेड़ हूँ

– आईनाम ईरिंग

 

मैं पेड़ हूँ
अडिग हूँ, अटल हूँ।

क्या हुआ जो पतझर के मौसम ने
सारे पत्ते ही पीले कर दिए।
क्या हुआ जो बैरन हवा ने
डाल से सारे पत्ते ही झाड़ दिए।
पर मैं ज़िन्दा हूँ अभी, अंदर से
और मुझ में शक्ति है
फिर से हरियाली बिखेरने की
मैं पेड़ हूँ
अडिग हूँ, अटल हूँ।
क्या हुआ जो बरसात से
भीग रहा मेरा सारा बदन
क्या हुआ जो करारी धूप से
जल रहा मेरा सारा शरीर
पर मैं ज़िन्दा हूँ अभी, अन्दर से
और मुझ में हुनर है
मुसीबतों से हो कर गुजरने की

strong woman
मैं पेड़ हूँ
अडिग हूँ, अटल हूँ।
मैं पेड़ हूँ
शीतल हूँ, कोमल हूँ
क्या हुआ जो मौसमों से
अक्सर मात खाता हूँ
क्या हुआ जो किस्मत ने
जड़ों को मेरे बाँध कर रख दिया।
पर मैं ज़िन्दा हूँ अभी, अन्दर से
और मुझ में हौसला है
बन्धकर रह कर भी बढ़ते जाने की।

Ayinam Ering

 

आईनाम ईरिंग
सहायक प्रोफेसर (हिंदी), दूरस्थ शिक्षा केन्द्र,
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
रोनो हिल्स, दोईमुख
अरुणाचल प्रदेश-791112
मो.: 09402239399

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