ऑनलाइन डेस्क/लिविंग इंडिया: 

एक कशक सी उठती है इस दिल में कि तुम्हें शब्दों का रूप नहीं दे पाया।
एक टिस सी उठती है कि तुम नहीं हो,
आखिर क्यूँ नहीं हो?
पता है, तुमको “माँ” कहकर पुकारते हैं ना,
कहने को एक अक्षर है लेकिन एक शब्दकोश सा जान पड़ता है यह,
जैसे सृष्टि की हक़ीक़त और वक्त की पहचान करवा रहा हो।
आज एक तस्वीर है हाँथ में तुम्हारी,

आखिर क्यूँ नहीं हो?

शब्दों में तुम्हारा समा पाना संभव नहीं, ना तुम छंदों में बसोगी,
रंगो से खेलना मुझे आता नहीं,
खुद को लिखूँ कभी तो उतर आना पन्नो पे स्याही से।
एक अनकही सी काया,
चंद सीढ़ियाँ चढ़कर तुम्हारा वो रुकना और मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखकर कहना,
मैं थकती कहाँ हूँ “, अज़ीब सी मासूमियत थी उन बातों में,
जैसे तुम आज भी सूर्य की लालीमा में नज़र आती हो,
तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ और लगता है जैसे रूप लिया है तुमने,
मेरे ही छत पे उगोगी, अस्त होती हो बहुत दूर?
आज वक्त आगे निकल आया या,

आखिर क्यूँ नहीं हो?
तुम पीछे छूट गयी? पता नहीं।
आँखें मूँद लेना आसान है,
वक्त के साथ चलना,
अश्कों से खुशियाँ सींचना और फिर गुम हो जाना,
ये कैसी गुमशुदगी?
उँगलियाँ आज भी कहती है मेरी,
वो बचपन में जिसने थामी थी,
रास्ते भी सही थे और बाख़ुदा पकड़ भी।
लो हार गया मैं, नहीं लिखूंगा तुम्हें कभी,
तुम पानी की तरह हो,
ना जाने क्यूँ बहने लगी?

तुम्हारा,likhne ki talb
सचिन❣
#अपनी_कलम

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