न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : शभर में दिवाली के त्यौहार का जश्न है। जश्न रामचंद्र जी के 14 साल के बनवास से वापस लौटने का, लेकिन हिंदुओं के साथ सिखों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। सिख इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के रुप में मनाते है। बंदी छोड़ दिवस मतलब मुक्ति दिवस। इसके साथ सिख इतिहास की कई घटनाएं जुड़ी हुई है, जिनमें मुख्य़ रुप से है जब मीरी-पीरी के मालिक श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के 52 राजों के साथ रिहा होकर श्री हरमंदिर साहिब आए थे। चलिए अब आपको बता दें है इसका इतिहास – पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी की बेमिसाल और शांतिमय शहादत सिख इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ ले कर आई।

गुरुओं की शहादत के बाद छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने गुरुगद्दी की परंपरागत रस्म को समय की जरुरत के मुताबिक बदला और गुरुआई धारण करने के दौरान मीरी और पीरी की 2 किरपाणें पहनीं और श्री अकाल तखत साहिब जी की सिरजना की। जहां दीवान सजाए जाते और कीर्तन दरबार लगाए जाते। वहीं गुरु साहिब ने सिख संगतों को आते समय नस्लीय घोड़े और शस्त्र लाने के भी आदेश जारी किए। इसके साथ नौजवानों की फौज तैयार कर उन्हें जंग की ट्रेनिंग दी जाने लगी। जिसके चलते गुरु घर के विरोधियों ने जहांगीर के पास गुरु साहिब के विरुद्ध कान भरने शुरु कर दिए, जिसके बाद छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद सिंह साहिब जी को पंजाब में बगावत को शह देने के आरोप में ग्वालियर के किले में नजरबंद कर दिया गया।

गुरु साहिब के पहुंचने से ग्वालियर के किले में सुबह शाम कीर्तन दरबार सजने लगा। उधर गुरु साहिब की नजरबंदी लंबी होने के कारण सिख संगतों में बेचैनी बढ़ने लगी। सिख संगतों का एक जत्था श्री अकाल तखत साहिब में अरदास करके बाबा बुड्ढा जी की अगुवाई में ग्वालियर के किले की ओर रवाना हुआ। जब यह जत्था ग्वालियर के किले पहुंचा तो सिख संगतों को गुरु साहिब से मुलाकात या दर्शन करने की इजाजत नहीं मिली। दूसरी तरफ मियां मीर जी को गुरु साहिब जी की रिहाई संबंधी जहांगीर से बातचीत कर कामयाबी मिल गई, पर गुरु हरगोबिंद सिंह साहिब जी ने अकेले किले से रिहा होना स्वीकार नहीं किया।

गुरु साहिब की रहमत से किले में नजरबंद 52 राजपूत राजाओं को भी नजरबंदी से मुक्ति मिली। उसी दिन से गुरु साह्ब जी को बंदी छोड़ दाता के नाम से भी जाने जाना लगा। रिहाई के बाद श्री गुरु हरगोबिंद सिंह जी 52 राजाओं के साथ श्री हरमंदिर साहिब पहुंचे। उस दिन दिवाली का दिन था, सिख संगतों ने घरों में घी के दीये जलाए और श्री हरमंदिर साहिब में खुशी में दीपमाला की गई। उसी दिन से आज तक अमृतसर में यह त्यौहार ‘बन्दी छोड़ दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। बंदी छोड़ दिवस पर श्री हरमंदिर साहिब में देश-विदेश से श्रद्धालु आकर गुरु घर में नतमस्तक होते है। साथ ही अमृतसर की दिवाली के लिए यह कहा गया है की ‘दाल रोटी घर की, दिवाली अमृतसर की’

 

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