न्यूज डेस्क/लिविंग इंडिया : हिमाचल का कुल्लू एक हिल स्टेशन है। चारों तरफ प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बसे इस शहर की छवि इतनी मनमोहक है कि आप यहां आकर यहीं के रह जाएंगे। इसके अलावा भी कुल्लू की एक विशेषता है, यहां मनाए जाने वाले दशहरे की। दरअसल कुल्लू का दशहरा देश ही नहीं विदेश में भी लोकप्रिय है और हर साल बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने आते हैं। पूरी पौराणिकता से मनाए जाने वाले कुल्लू के दशहरे की अपनी खूबी है। दशहरे को लेकर शानदार जुलूस निकाला जाता है, ढोल, नगाड़ों के साथ सुंदर कपड़ों में सजे-धजे लोग जुलूस में शामिल होते हैं।

रघुनाथजी की वंदना से शुरू होता दशहरा

कुल्लू के दशहरे की शुरूआत मुख्य देवता रघुनाथ जी की पूजा से होती है। इसके बाद अन्य देवताओं की मूर्तियों को रंग-बिरंगी पालकियों में आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। फिर जुलूस निकाला जाता है, जिसमें नृत्य मंडलियों की टोली शामिल होती है। साथ ही जुलूस में शामिल लोग कुल्लू नगर में देवता रघुनाथ जी की वंदना करते हैं और इस तरह दशहरे का उत्सव शुरू हो जाता है। दशमी के दिन इस उत्सव को लेकर खासी चहल-पहल देखी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसी दिन से कुल्लू का दशहरा शुरू हो जाता है।

दशमी से शुरू हो जाता दशहरे का उत्सव

कुल्लू के दशहरे की सबसे खासियत यह है कि जब सारे देश में दशहरा खत्म हो जाता है तो यहां शुरू होता है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां दशहरा रावण, कुंभकर्ण, मेघनाथ के पुतलों को दहन करके नहीं मनाया जाता है। सात दिनों तक चलने वाले कुल्लू के दशहरे के यह उत्सव हिमाचल के लोगों की संस्कृति और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। इसी उत्सव के दौरान भगवान रघुनाथ जी कि रथयात्रा निकाली जाती है। मान्यता है कि जिस दिन रथयात्रा निकाली जाती है उस दिन करीब एक हजार देवी-देवता पृथ्वी पर आते हैं और वो रथयात्रा में शामिल होते हैं।

राजघराने की देवी हिडिंबा का कुल्लू आगमन

उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी, मनाली की हिडिंबा का कुल्लू आगमन होता है। हिडिंबा को राजघराने की देवी भी माना जाता है। कुल्लू में प्रवेशद्वार पर उनका विधिवत स्वागत किया जाता है और राजमहल में प्रवेश कराया जाता है। हिडिंबा के बुलावे पर राजघराने के सदस्य उनका आर्शीवाद लेते हैं। इसके उपरांत धालपुर में हिडिंबा का प्रवेश होता है। छठे दिन सभी देवी-देवता एकसाथ आकर मिलते हैं, इसे ‘मोहल्ला’ कहा जाता है। रघुनाथ जी के इस पड़ाव पर आसपास का नजारा देखने लायक होता है। हर तरफ रंगबिरंगी पालकियों की झलक देखने को मिलती है।

मंदिर में पुर्नस्थापना के साथ दशहरा संपन्न

कुल्लू के दशहरे के सातवें दिन रथ को व्यास नदी के किनारे ले जाया जाता है जहां कंटीले पेड़ को लंका दहन के रूप में जलाया जाता है। इस दौरान जानवरों की बलि भी दी जाती है। इसके बाद रथ वापस लाया जाता है और रघुनाथ जी को रघुनाथपुर के मंदिर में पुर्नस्थापित किया जाता है। इसके साथ ही कुल्लू का दशहरा संपन्न हो जाता है। दरअसल कुल्लू के दशहरे की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भगवान राम के अयोध्या से कुल्लू आगमन पर भी आधारित है। कुल मिलाकर कहें तो कुल्लू के दशहरे में आज भी आपको पौराणिक परंपरा और भारतीय संस्कृति की अतुलनीय झलक देखने को मिल जाएगी।

जगत सिंह के राज में शुरू हुआ कुल्लू दशहरा  

कुल्लू में विजयादशमी से दशहरा मनाने की शुरूआत राजा जगत सिंह के शासनकाल में शुरू हुई। दरअसल राजा जगत सिंह को असाध्य रोग था। इससे छुटकारा पाने के लिए महात्मा किशन दास ने उन्हें कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा स्थापित करने की सलाह दी। जिसके बाद राजा जगत सिंह ने 1651 में अयोध्या से एक प्रतिमा लाकर स्थापित की और मूर्ति का चरणामृत सेवन किया। इससे उनका असाध्य रोग दूर हो गया। इसके बाद राजा ने अपना सारा जीवन और राज्य भगवान को अर्पित कर दिया। इस तरह से यहां दशहरे का त्योहार धूमधाम से मनाया जाने लगा।

 

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